मौत तेरा मुक़द्दर यहाँ
एक दिन क़ब्र ही घर यहाँ
ख़ूब-सूरत महल थे कभी
अब बने हैं वो बंजर यहाँ
हो गए ख़ाक वो लोग सब
थे कभी जिन के लश्कर यहाँ
मौत सबका मुक़द्दर बना
फिर हो अकबर या कम-तर यहाँ
देखते तो सभी हैं मगर
भूलते मौत अक्सर यहाँ
यारी नायाब है जान ले
वो हक़ीक़ी है गौहर यहाँ
हो मुहब्बत तिरी ज़िंदगी
बस यहीं उम्दा जौहर यहाँ
माल तेरा सभी फ़ानी है
बस मुहब्बत है रहबर यहाँ
देख ‘बेताब’ तू ग़ौर कर
मौत जो रोज़ मज़हर यहाँ
— Betaab Murtaza















