ऐ दिल बता तू हो रहा बेताब क्यूँ
मायूसियों का तुझ पे हैं सैलाब क्यूँ
फ़िक्र-ओ-तरद्दुद ज़िंदगी के हिस्से हैं
फिर देखता बस ख़ुशियों के ही ख़्वाब क्यूँ
जो नेमतें तुझ को मिली गिनता नहीं
फिर जो नहीं बस वो भला नायाब क्यूँ
मिट्टी है मिट्टी में ही मिल जाएगा तू
ख़ुद को समझता रहता है अर्बाब क्यूँ
हर हाल में बस सब्र से ही काम लें
ये याद तू रखता नहीं ‘बेताब’ क्यूँ
— Betaab Murtaza















