"कश्मकश"
अजीब कश्मकश में
मन जिस के वश में
तरह-तरह के सवाल हैं
न मिलते जवाब हैं
सच की तलाश है
न मिलते जवाब हैं
किसे कहूँ
कहाँ जाऊँ
सुकूँ-ए-दिल कहाँ से लाऊँ
हाल-ए-दिल न बयाँ किया
बे-ताबी में क़लम उठायी लिख लिया
जैसे ढूँढ़ता है परिंदा अपने अधिकारों को
वैसे ढूँढ़ तू भी अपने जवाबों को
— Betaab Murtaza















