ज़ख़्म है दर्द है दवा भी है
जैसे जंगल है रास्ता भी है
यूँ तो वादे हज़ार करता है
और वो शख्स भूलता भी है
हम को हर सू नज़र भी रखनी है
और तेरे पास बैठना भी है
यूँ भी आता नहीं मुझे रोना
और मातम की इब्तिदा भी है
चूमने हैं पसंद के बादल
शाम होते ही लौटना भी है
वस्ल की बात ही नहीं होती
इस तरह आशिक़ी नहीं होती
आग ख़ुद को लगाए बैठा हूँ
फिर भी क्यों रौशनी नहीं होती
हिज्र में ही तो ये सहूलत है
वस्ल में शायरी नहीं होती
आप रोने लगे हैं सरगम में
इस क़दर खो गए हैं मातम में
हिज्र का दुख, विसाल के आँसू
लुत्फ़ है दो नदी के संगम में
इश्क़ इक मोजज़ा सा लगता है
फूल खिलते हैं ज़र्द मौसम में
शब की तारीकियाँ बताएँगी
कितने आँसू छिपे हैं शबनम में
आरज़ू थी कि कभी उसके बराबर बैठूँ
और इतना ही नहीं हाथ पकड़ कर बैठूँ
तेरी दुनिया में पस-ओ-पेश बहुत हैं साक़ी
इस से बेहतर है कि मैं शेर कहूँ घर बैठूँ
तुम तो मसरूफ़ बहुत रहने लगे हो ख़ुद में
मुंतज़िर हूँ मैं, अगर तुम कहो बाहर बैठूँ
महसूस कर रहा हूँ तेरा शुमार ख़ुद में
सो झाँकने लगा हूँ मैं बार-बार ख़ुद में
तेरी चमक से रौशन हर रहगुज़ार होगा
इतना तो मेरे जुगनू रख ऐतबार ख़ुद में
कौन देता है सदा हमको घने जंगल में
तू है या तेरा तसव्वुर है भरे जंगल में
कोई मंज़िल है न रास्ता है न साया कोई
मैं अकेला ही भटकता हूँ मेरे जंगल में