क्या खोया क्या पाया हम ने
यूँ ही वक़्त गँवाया हम ने
यूँ ही वक़्त गँवाया हम ने
ज़ेहन-ओ-दिल का साया हम ने
शायद कमतर पाया हम ने
दौलत शोहरत ख़ूब कमाई
लेकिन ख़ाक कमाया हम ने
नज़्में लिक्खी ग़ज़लें गाई
दिल को यूँ बहलाया हम ने
झूठी क़स
में गीता की लीं,
कितना पाप कमाया हम ने
ख़ुशियों की ख़ातिर तड़पे हम
ग़म को रोज़ गँवाया हम ने
जंग हुई ख़ुद की 'सलमा' से
ज़ुल्म ख़ुदी पर ढ़ाया हम ने
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मिरे बा'द मेरी कहानी रहेगी
तुझे याद मेरी निशानी रहेगी
तुझे याद मेरी निशानी रहेगी
भुला देंगी दुनिया ये किस्से-कहानी
मिरी तो मगर मुँह ज़बानी रहेगी
रहेगा जहाँ में वो नाम-ए-ख़ुदा भी
ख़ुदा की तो हर इक निशानी रहेगी
तिरी प्यास को ये समुंदर भी होगा
मगर लब पे तिश्ना-दहानी रहेगी
अना किस लिए है,सभी कुछ हैं फ़ानी
भला क्या तिरी ज़िन्दगानी रहेगी
भले रोक लो आज 'सलमा' के रस्ते
मैं दरिया हूँ मेरी रवानी रहेगी
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ख़ुदा ने भी क्या ख़ूब ही ये ख़ुदाई बनाई,
उठा कर इसी ख़ाक से ख़ाक में ही मिलाई
उठा कर इसी ख़ाक से ख़ाक में ही मिलाई
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ये नहीं मंज़िल फ़क़त इक रास्ता है
ज़िन्दगी ग़म के सिवाए और क्या है
ज़िन्दगी ग़म के सिवाए और क्या है
शौक़ कहते है जिसे कुछ भी नहीं है
ये किताबत तो ग़म-ए-दिल का पता है
ज़िन्दगी को भी है तुम से कुछ शिकायत
बस तुम्हें ही तो नहीं इस से गिला है
फ़ायदा नुक़सान इस
में तो न देखो
ये मोहब्बत है, न कोई मशग़ला है
आरज़ू थी ख़्वाहिशें हो सब मुक़म्मल
अब मगर हर एक ख़्वाहिश आबला है
ख़ून से लिखते हैं हर इक शे'र अपना
शा'इरी ये शाइरों का मोजिज़ा है
है रदीफ़-ओ-काफ़िए 'सलमा' ज़रूरी
हर ग़ज़ल इन के बिना तो बे-मज़ा है
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हर चोट खाया शा'इरी तो करता है
हर चोट खाया तो मगर शाइ'र नहीं
हर चोट खाया तो मगर शाइ'र नहीं
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अच्छी लगती हैं किताबें कातिबों को
और लिखना है महज़ इक शौक़ उन का
और लिखना है महज़ इक शौक़ उन का
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