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KUNAL shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in KUNAL's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

लगे किसी को ज़ाकिर और बोले कोई जौन हैं ये जानना न चाहे कोई कुनाल आप कौन हैं — KUNAL
ख़ैर कुनाल ये दौर मुबारक क्या क्या सहना है गुमनामी भी बदनामी भी और आप मौन हैं — KUNAL
ब्याह रचाया उस सेे कल इज़्ज़त लूट उस की परसों बरी हुआ हूँ गुनाह कर के और ईनाम मिला है — KUNAL
कहाँ कहाँ से उसे निकालूँ कि एक उस का पता नहीं है है ऐसा कुछ क्या मेरे बदन में जहाँ कभी वो रहा नहीं है — KUNAL
दुनिया से तो जीत गए हम लेकिन ख़ुद से हारे हैं हम ने भी कुछ ख़्वाब सजाकर इन आँखों में मारे हैं — KUNAL

Ghazal

बनाना था कुछ सो ज़िंदगी को मैं इक तमाशा बना रहा हूँ बड़ा ही अच्छा बना रहा हूँ बहुत ही ख़ासा बना रहा हूँ किसी महल तख़्त-ओ-ताज की मुझ को कोई चाहत न है न होगी बना के कुटिया फ़क़ीर की मैं अब उस का कासा बना रहा हूँ बनाओ मंदिर या इस पे मस्जिद शराब ख़ाना या पाठशाला ख़ुदा का घर ये लगा के तख़्ती मैं एक ढाँचा बना रहा हूँ है कौन ईसाई कौन हिंदू या सिख मुसलमाँ ये तुम ही जानो मेरी तरफ़ से तो मैं सभी को मेरे ही जैसा बना रहा हूँ या कह लो हिंदी कहो या उर्दू या हिंदवी रेख़्ता ही कह लो जो दिल से दिल तक पहुँच रही है इक ऐसी भाषा बना रहा हूँ — KUNAL
नक़्श बनते हैं क़ियासी मेरी दीवारों पर और फैले है ग़वाशी मेरी दीवारों पर बाँध के हाथ सटा साथ की दीवारों से रोज़ लेता है तलाशी मेरी दीवारों पर रौशनी मुझ पे नहीं आती मगर रौज़न से चली जाती है ज़रा सी मेरी दीवारों पर साथ में साठ व सत्तर के है नाइंटी वन दूर अकेला है नवासी मेरी दीवारों पर पूछता कोई नहीं घर में मुझे बरसों से देख कितनी है शनासी मेरी दीवारों पर यूँँ भरी रहती है तस्वीरों से दीवार मगर फिर भी पसरी है निरासी मेरी दीवारों पर साथ कमरे पे मेरे होते हैं जौन-ओ-नासिर रक़्स करती है उदासी मेरी दीवारों पर — KUNAL
याद आना तुझे चाहता हूँ याद आए तेरी चाहता हूँ मैं तेरा होना भी चाहता हूँ मैं तुझे पाना भी चाहता हूँ जीने मरने की क़स में हैं झूठी खा रहा हूँ भले साथ हर दम साथ जीना तो है मुझ को तेरे मौत पहले मेरी चाहता हूँ सिर्फ़ मौसम बहाराँ नहीं गर हो ख़िज़ाँ भी अगर फ़र्क क्या है मुझ को उगना है डाली पे तेरी सूख झड़ जाना भी चाहता हूँ यूँँ ही होकर के मैं तुम से ग़ुस्सा बंद कर दूँ कभी करनी बातें तुम से लड़ने को यूँँ बे-वजह ही मैं बहाना कोई चाहता हूँ बस मुहब्बत नहीं दरमियाँ हो साथ में हों ये शिकवे गिले भी रूठना भी कभी मुझ को तुम से और मनाना कभी चाहता हूँ जीत लूँ मैं मुहब्बत में तुझ को सिर्फ़ इतना ही मक़सद नहीं है बस मुहब्बत को पाना नहीं है क्या निभाना है जी चाहता हूँ — KUNAL

Nazm

"लेदर जैकेट" हँसी रुख़ पर ख़ुशी दिल में ज़बाँ पर बहुत नर्मी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में मैं यूँँही मुस्कुराया करता था तब कहीं जब ज़िक्र चलता था तुम्हारा वहीं दुनिया ठहर जाती थी सारी नहीं था वक़्त को चलना गवारा नहीं तब रात ढलती थी हमारी नहीं तब दिन ही चढ़ता था हमारा थे सुब्ह-ओ-शाम रहते साथ हम और हमेशा बात ही करते थे हम पर अधूरी ही रही हर बात वो जो हमें करनी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में कसौली और शिमला के हमारे ख़याली टूर बनते ख़ूब थे तब तुम्हारा सूट और कुर्ता मेरा वो हसीं ख़्वाबों के सुंदर रूप थे तब हमें चौबीस घंटे कम पड़े थे बड़ी जल्दी बढ़ी थी हर घड़ी तब ख़यालों में मिलन के जीते मरते हमें छोटी लगी थी ज़िंदगी तब कुनाल उस रात मुझ को सोने देना बहुत बेशर्मी थी मनमर्ज़ियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में न ये रम थी न ये ग़म थे न ऐसे अधूरे और आधे से न हम थे तेरी लहराती थी ज़ुल्फ़ें हवा में नहीं इन में कहीं भी कोई ख़म थे वो कंटेसा बगल की सीट जिस पर तुम अक्सर बैठ कर लड़ती थी मुझ से वहाँ अब बैठता कोई नहीं है अब उस के नीचे इक बोतल पड़ी है जो कल तक चूर था तेरे नशे में उसे इस के नशे में सुध नहीं है वही आवारा था मैं साथ तेरे वही आवारा हूँ मैं बा'द तेरे बहुत ख़ुश-फ़हमी रहती थी मुझे पर उन आवारा हमारी गर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में — KUNAL
"अनबोदर्ड" अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से इक याद सी दिल में बस्ती है तू जिस में खुल के हँसती है माना कि मेरी ये ज़िंदगी अब उस एक हँसी को तरसती है इक जैसा ही दुख लगता है तेरे हँसने से या रोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से बीती बातों को याद करूँँ पाने की तुझे फ़रियाद करूँँ जो ठीक लगा वो किया तू ने मैं क्यूँँ ख़ुद को बर्बाद करूँँ मैं निकाल रहा हूँ अब तुझ को इस दिल के कोने कोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से मैं अजीब परेशाँ बैठा हूँ ये कौन हूँ मैं और कैसा हूँ धोखा तेरा शर्मिंदा मैं मैं अब भी पहले जैसा हूँ तू खेली तोड़ दिया तो क्या दिल होते ही हैं खिलौने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से — KUNAL
"ऊपर पंखा चलता है" वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है जब पंखा बंद ये होता है तब बेबी जाग उठ रोता है फिर इक दिन ऐसा आएगा बेबी ये बड़ा हो जाएगा इसे दुनिया समझ आ जाएगी कोई बात बड़ा इसे खाएगी कुछ दिन तो ये बस रो लेगा दुनिया के माफ़िक हो लेगा कुछ हद तक तो ये सह लेगा कुछ दिन तन्हा भी रह लेगा ये दुख तकलीफ़ें झेलेगा पर मुँह से कुछ नहीं बोलेगा जब ग़म हद से बढ़ जाएगा ये कुछ भी सह नहीं पाएगा जब हर दिन इस को खटकेगा ये बैठा बैठा भटकेगा फिर इक दिन यूँँ ही बे-मतलब ये घर की छत को देखेगा फिर छत से हटकर ध्यान इस का आ कर पंखे पर अटकेगा ये तब पंखे पर लटकेगा तब पंखा चलता जाएगा बेबी सोता रह जाएगा तब लाख करो पंखे को बंद फिर बेबी उठ नहीं पाएगा सब बैठ के इस को रोएँगे और बेबी चुप हो जाएगा ये खेल अज़ल से चलता है सदियों से यही सब होता है वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है — KUNAL