"अनबोदर्ड"
अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को
तेरे होने से न होने से
इक याद सी दिल में बस्ती है
तू जिस में खुल के हँसती है
माना कि मेरी ये ज़िंदगी अब
उस एक हँसी को तरसती है
इक जैसा ही दुख लगता है
तेरे हँसने से या रोने से
अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को
तेरे होने से न होने से
बीती बातों को याद करूँ
पाने की तुझे फ़रियाद करूँ
जो ठीक लगा वो किया तू ने
मैं क्यूँ ख़ुद को बर्बाद करूँ
मैं निकाल रहा हूँ अब तुझ को
इस दिल के कोने कोने से
अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को
तेरे होने से न होने से
मैं अजीब परेशाँ बैठा हूँ
ये कौन हूँ मैं और कैसा हूँ
धोखा तेरा शर्मिंदा मैं
मैं अब भी पहले जैसा हूँ
तू खेली तोड़ दिया तो क्या
दिल होते ही हैं खिलौने से
अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को
तेरे होने से न होने से















