"ऊपर पंखा चलता है"
वो ऊपर पंखा चलता है
और नीचे बेबी सोता है
जब पंखा बंद ये होता है
तब बेबी जाग उठ रोता है
फिर इक दिन ऐसा आएगा
बेबी ये बड़ा हो जाएगा
इसे दुनिया समझ आ जाएगी
कोई बात बड़ा इसे खाएगी
कुछ दिन तो ये बस रो लेगा
दुनिया के माफ़िक हो लेगा
कुछ हद तक तो ये सह लेगा
कुछ दिन तन्हा भी रह लेगा
ये दुख तकलीफ़ें झेलेगा
पर मुँह से कुछ नहीं बोलेगा
जब ग़म हद से बढ़ जाएगा
ये कुछ भी सह नहीं पाएगा
जब हर दिन इस को खटकेगा
ये बैठा बैठा भटकेगा
फिर इक दिन यूँ ही बे-मतलब
ये घर की छत को देखेगा
फिर छत से हटकर ध्यान इस का
आ कर पंखे पर अटकेगा
ये तब पंखे पर लटकेगा
तब पंखा चलता जाएगा
बेबी सोता रह जाएगा
तब लाख करो पंखे को बंद
फिर बेबी उठ नहीं पाएगा
सब बैठ के इस को रोएँगे
और बेबी चुप हो जाएगा
ये खेल अज़ल से चलता है
सदियों से यही सब होता है
वो ऊपर पंखा चलता है
और नीचे बेबी सोता है















