"डू इट"
मैं निकल एक दिन घर से बस चल पड़ा
सोचा समझा न कुछ बस मैं आगे बढ़ा
जब मैं चलते हुए थोड़ा थक सा गया
फिर ठहरने को मन मेरा करने लगा
और चलने की हिम्मत नहीं जब रही
मुझ को थोड़ी सी दूरी पे झील इक दिखी
फिर मैं उस झील की ओर बढ़ने लगा
झील पर जैसे तैसे मैं पहुँचा भला
मैं किनारे पे अब झील के था खड़ा
और कई देर तक बस खड़ा ही रहा
मेरे अंदर का बच्चा बड़ा दोनों ही
मुझ को इक साथ कहते रहे कूद जा
— KUNAL















