बनाना था कुछ सो ज़िंदगी को मैं इक तमाशा बना रहा हूँ
बड़ा ही अच्छा बना रहा हूँ बहुत ही ख़ासा बना रहा हूँ
किसी महल तख़्त-ओ-ताज की मुझ को कोई चाहत न है न होगी
बना के कुटिया फ़क़ीर की मैं अब उस का कासा बना रहा हूँ
बनाओ मंदिर या इस पे मस्जिद शराब ख़ाना या पाठशाला
ख़ुदा का घर ये लगा के तख़्ती मैं एक ढाँचा बना रहा हूँ
है कौन ईसाई कौन हिंदू या सिख मुसलमाँ ये तुम ही जानो
मेरी तरफ़ से तो मैं सभी को मेरे ही जैसा बना रहा हूँ
या कह लो हिंदी कहो या उर्दू या हिंदवी रेख़्ता ही कह लो
जो दिल से दिल तक पहुँच रही है इक ऐसी भाषा बना रहा हूँ
— KUNAL















