इजाज़त हो अगर इक बात पूछूँ
हमारी बात अब होती नहीं क्यूँ
तुम्हारा हाथ हाथों में नहीं है
सिकंदर हूँ मगर हारा हुआ हूँ
अधूरी दास्ताँ फिर रह गई है
वही बरसों पुराने क़िस्से की जूँ
मरीज़-ए-इश्क़ हूँ पत्थर उठाओ
समझ लो आज से मुझ को भी मजनूँ
नहीं क़ाएल थे जब दौड़ा रगों में
फिरे है ख़ौलता सड़कों पर अब ख़ूँ
— KUNAL















