KUNAL
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Nazm

"लेदर जैकेट"

हँसी रुख़ पर ख़ुशी दिल में ज़बाँ पर
बहुत नर्मी थी पिछली सर्दियों में
तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर
बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में

मैं यूँही मुस्कुराया करता था तब
कहीं जब ज़िक्र चलता था तुम्हारा
वहीं दुनिया ठहर जाती थी सारी
नहीं था वक़्त को चलना गवारा
नहीं तब रात ढलती थी हमारी
नहीं तब दिन ही चढ़ता था हमारा
थे सुब्ह-ओ-शाम रहते साथ हम और
हमेशा बात ही करते थे हम पर
अधूरी ही रही हर बात वो जो
हमें करनी थी पिछली सर्दियों में
तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर
बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में

कसौली और शिमला के हमारे
ख़याली टूर बनते ख़ूब थे तब
तुम्हारा सूट और कुर्ता मेरा वो
हसीं ख़्वाबों के सुंदर रूप थे तब
हमें चौबीस घंटे कम पड़े थे
बड़ी जल्दी बढ़ी थी हर घड़ी तब
ख़यालों में मिलन के जीते मरते
हमें छोटी लगी थी ज़िंदगी तब
कुनाल उस रात मुझ को सोने देना
बहुत बेशर्मी थी मनमर्ज़ियों में
तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर
बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में

न ये रम थी न ये ग़म थे न ऐसे
अधूरे और आधे से न हम थे
तेरी लहराती थी ज़ुल्फ़ें हवा में
नहीं इन
में कहीं भी कोई ख़म थे
वो कंटेसा बगल की सीट जिस पर
तुम अक्सर बैठ कर लड़ती थी मुझ से
वहाँ अब बैठता कोई नहीं है
अब उस के नीचे इक बोतल पड़ी है
जो कल तक चूर था तेरे नशे में
उसे इस के नशे में सुध नहीं है
वही आवारा था मैं साथ तेरे
वही आवारा हूँ मैं बा'द तेरे
बहुत ख़ुश-फ़हमी रहती थी मुझे पर
उन आवारा हमारी गर्दियों में
तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर
बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में

— KUNAL

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