देखा जो कोई ख़्वाब तो अफ़सुर्दगी हुई
निकला जो माहताब तो अफ़सुर्दगी हुई
उलझे थे जब सवालों में तो मुतमइन थे हम
जब मिल गए जवाब तो अफ़सुर्दगी हुई
सफ़्हे पलट रहा था मैं दिल की किताब के
देखा जो वो गुलाब तो अफ़सुर्दगी हुई
अलगाव था मगर अभी रावी थीं दूरियाँ
वो बन गईं चनाब तो अफ़सुर्दगी हुई
ज़ुल्म-ओ-सितम तो ठीक प सरकार आपने
महँगी जो की शराब तो अफ़सुर्दगी हुई
— KUNAL















