रोज़ सता कर मार दिया फिर
और जुदा कर मार दिया फिर
रोज़ पकाया आँच पे मध्यम
और जला कर मार दिया फिर
रोज़ लगाया बाग़ में पौधा
और सुखा कर मार दिया फिर
रोज़ उड़ाया हाथ से पंछी
और गिरा कर मार दिया फिर
रोज़ उतारी नाव नदी में
और डुबा कर मार दिया फिर
रोज़ जलाया राह में दीपक
और बुझा कर मार दिया फिर
रोज़ बुलाया याद को मिलने
और भुला कर मार दिया फिर
रोज़ लिखाया हाथ पे नाम इक
और मिटा कर मार दिया फिर
रोज़ उठाया पीठ पे पत्थर
और लुढ़ा कर मार दिया फिर
रोज़ कुनाल इक दुख को रुलाया
और हँसा कर मार दिया फिर
— KUNAL















