डर ही नहीं किसी का तो अब क्यूँँ घबराए बैठे हैं
रस्ता सीधा था तो फिर किस मोड़ पे आए बैठे हैं
ढूँढ़ रहा था शख़्स हमें जो पास हमारे आ बैठा
किस से उस को मिलवाते हम ख़ुद को भुलाए बैठे हैं
ग़लत लगाते हो अंदाज़ा देख इन शांत से चेहरों को
ये वोल्केनो भीतर इक सैलाब छुपाए बैठे हैं
जिस्म का सौदा करता रहता हूँ दिल को कैसे बेचूँ
यही है एक अमानत उस की जिस को बचाए बैठे हैं
सिम तोड़ा फिर फ़ोन जलाया आग लगाई ख़ुद को और
फिर कुर्सी पर बैठे और हम ज़हर भी खाए बैठे हैं
— KUNAL















