KUNAL
KUNAL
Ghazal

डर ही नहीं किसी का तो अब क्यूँँ घबराए बैठे हैं

रस्ता सीधा था तो फिर किस मोड़ पे आए बैठे हैं

ढूँढ़ रहा था शख़्स हमें जो पास हमारे आ बैठा
किस से उस को मिलवाते हम ख़ुद को भुलाए बैठे हैं

ग़लत लगाते हो अंदाज़ा देख इन शांत से चेहरों को
ये वोल्केनो भीतर इक सैलाब छुपाए बैठे हैं

जिस्म का सौदा करता रहता हूँ दिल को कैसे बेचूँ
यही है एक अमानत उस की जिस को बचाए बैठे हैं

सिम तोड़ा फिर फ़ोन जलाया आग लगाई ख़ुद को और
फिर कुर्सी पर बैठे और हम ज़हर भी खाए बैठे हैं

— KUNAL

More by KUNAL

Other ghazal from the same pen

See all from KUNAL →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling