KUNAL
KUNAL
Ghazal

अब्र-पारे भी कभी चाँद हुआ करते थे

आबशारे भी कभी चाँद हुआ करते थे

अब फ़क़त आग धधकती है सभी सीनों में
दिल शरारे भी कभी चाँद हुआ करते थे

चाँद में दाग़ है ये झूठ कहा करते हैं
रंग कारे भी कभी चाँद हुआ करते थे

इन फ़रिश्तों की ज़मीं पर थी रिहाइश पहले
घर हमारे भी कभी चाँद हुआ करते थे

ये जो कुछ दूर तेरे बिखरे पड़े रहते हैं
चाँद तारे भी कभी चाँद हुआ करते थे

आज हालात मेरे और बयाँ करते हैं
हम कुँवारे भी कभी चाँद हुआ करते थे

— KUNAL

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