महरूमियाँ छुपाने को औक़ात मिल गई
मुफ़्लिस को आशिक़ों में मुसावात मिल गई
सिगरेट पड़ी थी जेब में आतिश का दोष क्या
दुख दूसरा था आप की तो बात मिल गई
सूरज जला रहा था वो सीने में रात दिन
फिर यूँ हुआ कि अर्श को बरसात मिल गई
तुम से छुड़ा के हाथ फिसलता चला गया
तन्हाई से मिला ही था फिर रात मिल गई
मज़हब तो माँ की कोख में ही मिल गया मुझे
आँखें अभी खुली नहीं थीं ज़ात मिल गई
— KUNAL















