नक़्श बनते हैं क़ियासी मेरी दीवारों पर
और फैले है ग़वाशी मेरी दीवारों पर
बाँध के हाथ सटा साथ की दीवारों से
रोज़ लेता है तलाशी मेरी दीवारों पर
रौशनी मुझ पे नहीं आती मगर रौज़न से
चली जाती है ज़रा सी मेरी दीवारों पर
साथ में साठ व सत्तर के है नाइंटी वन
दूर अकेला है नवासी मेरी दीवारों पर
पूछता कोई नहीं घर में मुझे बरसों से
देख कितनी है शनासी मेरी दीवारों पर
यूँ भरी रहती है तस्वीरों से दीवार मगर
फिर भी पसरी है निरासी मेरी दीवारों पर
साथ कमरे पे मेरे होते हैं जौन-ओ-नासिर
रक़्स करती है उदासी मेरी दीवारों पर
— KUNAL















