KUNAL
KUNAL
Ghazal

नक़्श बनते हैं क़ियासी मेरी दीवारों पर

और फैले है ग़वाशी मेरी दीवारों पर

बाँध के हाथ सटा साथ की दीवारों से
रोज़ लेता है तलाशी मेरी दीवारों पर

रौशनी मुझ पे नहीं आती मगर रौज़न से
चली जाती है ज़रा सी मेरी दीवारों पर

साथ में साठ व सत्तर के है नाइंटी वन
दूर अकेला है नवासी मेरी दीवारों पर

पूछता कोई नहीं घर में मुझे बरसों से
देख कितनी है शनासी मेरी दीवारों पर

यूँ भरी रहती है तस्वीरों से दीवार मगर
फिर भी पसरी है निरासी मेरी दीवारों पर

साथ कमरे पे मेरे होते हैं जौन-ओ-नासिर
रक़्स करती है उदासी मेरी दीवारों पर

— KUNAL

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