है दिल में रश्क बहुत और होंठ पे मुस्कान
यही तनाव तो लेगा किसी दिन अपनी जान
यही तनाव तो लेगा किसी दिन अपनी जान
मिला ख़िताब जो ब्रह्मा से वो न था काफ़ी
कहा वसिष्ठ ने ब्रह्मर्षि तो हुआ वरदान
चमन के नाम से फूलों के रंग-ओ-बू को क्या
जो इण्डिया कहो भारत कहो या हिंदुस्तान
न जाने कितनों के अरमान दफ़्न होंगे इधर
बुलाऊँ दफ़्तर इसे या बुलाऊँ क़ब्रिस्तान
ये आगही ये ज़हानत यही तो हैं हम में
इन्हें किसी को थमा क्यूँ रहे हैं हम इंसान
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हैं नहीं ख़ुद उदास आदमी हम
हाँ मगर ग़म शनास आदमी हम
हाँ मगर ग़म शनास आदमी हम
उस की मर्ज़ी कभी उतार ही दे
हैं तो उस के लिबास आदमी हम
एक लेखक का प्रेम आदमी तुम
और उस की भड़ास आदमी हम
एक सहरा की प्यास आदमी तुम
एक दरिया की प्यास आदमी हम
तुम को लगते हों या न लगते हों
हम को लगते हैं ख़ास आदमी हम
हुआ करते हैं हम कभी चरख़ा
और कभी हैं कपास आदमी हम
ख़ुद को लगते हैं हम दुरुस्त हवा से
या'नी हैं बद-हवा से आदमी हम
मुख़्तलिफ़ सूरतें हैं मिट्टी की
जानवर फूल घास आदमी हम
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फ़क़त टूटे नहीं हम जुड़ के फिर पनपे भी हैं देखो
सिवा ज़ख़्मों के दुनिया से मिले मिसरे भी हैं देखो
सिवा ज़ख़्मों के दुनिया से मिले मिसरे भी हैं देखो
मुहब्बत बाग़ से करते हो तो कैसी तरफ़दारी
अगर गुल हैं तो पत्ते भी हैं और काँटे भी हैं देखो
जो दिखलाया गया था उस पे तो चलता रहा लेकिन
कोई ये काश कह देता अलग रस्ते भी हैं देखो
ये जो दुनिया की झोली है ये सचमुच ही निराली है
यहाँ दरवेश भी हैं और हम जैसे भी हैं देखो
तसल्ली हो गई क्या देख के आईने में ख़ुद को
किया जाए फिर अब एलान हम दिखते भी हैं देखो
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जीने में कोई मसअला ही नहीं
इस का मतलब है तू जिया ही नहीं
इस का मतलब है तू जिया ही नहीं
तीन चौथाई दुनिया पानी है
बस कि सहरा को कुछ मिला ही नहीं
कर्ण अर्जुन का हो गया इतिहास
एकलव्यों का कुछ हुआ ही नहीं
उस को हर सू सलाख़ें दिखती रहीं
होकर आज़ाद भी उड़ा ही नहीं
ये उजाले ये ख़ुश-मिज़ाज से लोग
जैसे कल कुछ यहाँ हुआ ही नहीं
छापने छपने की है क्या जल्दी
अभी तो हम ने कुछ लिखा ही नहीं
आप के बा'द 'अनन्त' महफ़िल में
स्थान जो रिक्त था भरा ही नहीं
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न जदीद है न रिवायती कुछ अजीब है
किसे क्या कहूँ मेरी शा'इरी कुछ अजीब है
किसे क्या कहूँ मेरी शा'इरी कुछ अजीब है
किसी मोड़ पर तो बताया कर कि चलें किधर
मेरे राहबर तेरी रहबरी कुछ अजीब है
तेरी ख़ामुशी में भी शोर है जो सुने कोई
बड़ी चुप सी है मेरी चीख़ भी कुछ अजीब है
कोई सुर्ख़ रौशनी रात के भी फ़लक में है
ये जो बात है तेरे शहर की कुछ अजीब है
मेरे ज़ेहन में ये शफ़क़ शफ़क़ सी है क्या बला
जो न जहल है न ही आगही कुछ अजीब है
अब 'अनन्त जी' वहाँ क्या तवक़्क़ो रखें बताएँ
कि जहाँ ग़ज़ल का रदीफ़ ही कुछ अजीब है
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हर वाक़िए में है मुझे अश'आर की तलाश
जैसे हो एक बनिये को व्यापार की तलाश
जैसे हो एक बनिये को व्यापार की तलाश
बाक़ी किसी मुआमले की कुछ नहीं पड़ी
कीजे ग़ज़ल में आप फ़क़त प्यार की तलाश
बीमार को फिर आइने में चारा-गर मिला
या'नी इक उम्र भर की थी बेकार की तलाश
दीवानगी है क्या है पता भी नहीं मुझे
पर सर को रोज़ है नए दीवार की तलाश
कर पाए जो अदा तेरे किरदार को 'अनन्त'
जारी है अब भी ऐसे अदाकार की तलाश
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ये तमन्ना थी देख कर तुझ को
आऊँ मैं भी कभी नज़र तुझ को
आऊँ मैं भी कभी नज़र तुझ को
थोड़ी मेहनत के बा'द ही मिलना
ढूँढ़ तो लूँ इधर उधर तुझ को
दिल के हर गोशे से सदा आई
याद करता है तेरा घर तुझ को
कौन किस को बनाता आया है
तू बशर को या फिर बशर तुझ को
आइना ही इक आसरा है अब
और तुझ सा मिले किधर तुझ को
क़त्ल ही इक शफ़ा है क्या तेरी
कौन कहता है चारा-गर तुझ को
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