Ananth Faani

Top 10 of Ananth Faani

    है दिल में रश्क बहुत और होंठ पे मुस्कान
    यही तनाव तो लेगा किसी दिन अपनी जान

    मिला ख़िताब जो ब्रह्मा से वो न था काफ़ी
    कहा वसिष्ठ ने ब्रह्मर्षि तो हुआ वरदान

    चमन के नाम से फूलों के रंग-ओ-बू को क्या
    जो इण्डिया कहो भारत कहो या हिंदुस्तान

    न जाने कितनों के अरमान दफ़्न होंगे इधर
    बुलाऊँ दफ़्तर इसे या बुलाऊँ क़ब्रिस्तान

    ये आगही ये ज़हानत यही तो हैं हम में
    इन्हें किसी को थमा क्यूँ रहे हैं हम इंसान
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    Ananth Faani
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    हैं नहीं ख़ुद उदास आदमी हम
    हाँ मगर ग़म शनास आदमी हम

    उस की मर्ज़ी कभी उतार ही दे
    हैं तो उस के लिबास आदमी हम

    एक लेखक का प्रेम आदमी तुम
    और उस की भड़ास आदमी हम

    एक सहरा की प्यास आदमी तुम
    एक दरिया की प्यास आदमी हम

    तुम को लगते हों या न लगते हों
    हम को लगते हैं ख़ास आदमी हम

    हुआ करते हैं हम कभी चरख़ा
    और कभी हैं कपास आदमी हम

    ख़ुद को लगते हैं हम दुरुस्त हवा से
    या'नी हैं बद-हवा से आदमी हम

    मुख़्तलिफ़ सूरतें हैं मिट्टी की
    जानवर फूल घास आदमी हम
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    Ananth Faani
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    फ़क़त टूटे नहीं हम जुड़ के फिर पनपे भी हैं देखो
    सिवा ज़ख़्मों के दुनिया से मिले मिसरे भी हैं देखो

    मुहब्बत बाग़ से करते हो तो कैसी तरफ़दारी
    अगर गुल हैं तो पत्ते भी हैं और काँटे भी हैं देखो

    जो दिखलाया गया था उस पे तो चलता रहा लेकिन
    कोई ये काश कह देता अलग रस्ते भी हैं देखो

    ये जो दुनिया की झोली है ये सचमुच ही निराली है
    यहाँ दरवेश भी हैं और हम जैसे भी हैं देखो

    तसल्ली हो गई क्या देख के आईने में ख़ुद को
    किया जाए फिर अब एलान हम दिखते भी हैं देखो
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    Ananth Faani
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    जीने में कोई मसअला ही नहीं
    इस का मतलब है तू जिया ही नहीं

    तीन चौथाई दुनिया पानी है
    बस कि सहरा को कुछ मिला ही नहीं

    कर्ण अर्जुन का हो गया इतिहास
    एकलव्यों का कुछ हुआ ही नहीं

    उस को हर सू सलाख़ें दिखती रहीं
    होकर आज़ाद भी उड़ा ही नहीं

    ये उजाले ये ख़ुश-मिज़ाज से लोग
    जैसे कल कुछ यहाँ हुआ ही नहीं

    छापने छपने की है क्या जल्दी
    अभी तो हम ने कुछ लिखा ही नहीं

    आप के बा'द 'अनन्त' महफ़िल में
    स्थान जो रिक्त था भरा ही नहीं
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    Ananth Faani
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    सिसकते नहीं क्या वहाँ के परिंदे
    चहकते नहीं क्या यहाँ के परिंदे

    कहाँ आब-ओ-दाना कहाँ आशियाना
    कहाँ आ बसे हैं कहाँ के परिंदे

    रहेंगे भी तो साथ कब तक रहेंगे
    ज़मीं के हैं पेड़ आसमाँ के परिंदे

    क़फ़स का है छोटा बड़ा दाइरा बस
    क़फ़स में हैं सारे जहाँ के परिंदे
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    Ananth Faani
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    जदीद है न रिवायती कुछ अजीब है
    किसे क्या कहूँ मेरी शा'इरी कुछ अजीब है

    किसी मोड़ पर तो बताया कर कि चलें किधर
    मेरे राहबर तेरी रहबरी कुछ अजीब है

    तेरी ख़ामुशी में भी शोर है जो सुने कोई
    बड़ी चुप सी है मेरी चीख़ भी कुछ अजीब है

    कोई सुर्ख़ रौशनी रात के भी फ़लक में है
    ये जो बात है तेरे शहर की कुछ अजीब है

    मेरे ज़ेहन में ये शफ़क़ शफ़क़ सी है क्या बला
    जो न जहल है न ही आगही कुछ अजीब है

    अब 'अनन्त जी' वहाँ क्या तवक़्क़ो रखें बताएँ
    कि जहाँ ग़ज़ल का रदीफ़ ही कुछ अजीब है
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    Ananth Faani
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    कर रहे हैं सिसकने की आवाज़
    आ रही है चहकने की आवाज़

    ख़ामुशी सी है ख़ामुशी नहीं है
    हल्क़ में बात अटकने की आवाज़

    सुन कि भँवरे के पंख करते हैं
    किसी गुल के महकने की आवाज़

    काम लोरी का कर गई आख़िर
    रात भर छत टपकने की आवाज़

    कोई राम आएँ तो सुनें 'फ़ानी'
    इस शिला में धड़कने की आवाज़
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    Ananth Faani
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    हर वाक़िए में है मुझे अश'आर की तलाश
    जैसे हो एक बनिये को व्यापार की तलाश

    बाक़ी किसी मुआमले की कुछ नहीं पड़ी
    कीजे ग़ज़ल में आप फ़क़त प्यार की तलाश

    बीमार को फिर आइने में चारा-गर मिला
    या'नी इक उम्र भर की थी बेकार की तलाश

    दीवानगी है क्या है पता भी नहीं मुझे
    पर सर को रोज़ है नए दीवार की तलाश

    कर पाए जो अदा तेरे किरदार को 'अनन्त'
    जारी है अब भी ऐसे अदाकार की तलाश
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    Ananth Faani
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    ये तमन्ना थी देख कर तुझ को
    आऊँ मैं भी कभी नज़र तुझ को

    थोड़ी मेहनत के बा'द ही मिलना
    ढूँढ़ तो लूँ इधर उधर तुझ को

    दिल के हर गोशे से सदा आई
    याद करता है तेरा घर तुझ को

    कौन किस को बनाता आया है
    तू बशर को या फिर बशर तुझ को

    आइना ही इक आसरा है अब
    और तुझ सा मिले किधर तुझ को

    क़त्ल ही इक शफ़ा है क्या तेरी
    कौन कहता है चारा-गर तुझ को
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    Ananth Faani
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    रस्ता काट के जो भी निकली
    हर बिल्ली क्यूँ काली निकली

    ऐसा वक़्त बताने को तो
    घड़ी हमारी महँगी निकली

    तुम तो मेरी समझ से ज़ियादा
    काफ़ी ज़ियादा प्यारी निकली

    नज़्म समझ के पढ़ा था तुम को
    तुम भी ससुरी नस्री निकली

    तुकबंदी के चमन में फ़ानी
    ग़ज़ल इक उड़ती तितली निकली
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    Ananth Faani
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