है दिल में रश्क बहुत और होंठ पे मुस्कान
यही तनाव तो लेगा किसी दिन अपनी जान
मिला ख़िताब जो ब्रह्मा से वो न था काफ़ी
कहा वसिष्ठ ने ब्रह्मर्षि तो हुआ वरदान
चमन के नाम से फूलों के रंग-ओ-बू को क्या
जो इण्डिया कहो भारत कहो या हिंदुस्तान
न जाने कितनों के अरमान दफ़्न होंगे इधर
बुलाऊँ दफ़्तर इसे या बुलाऊँ क़ब्रिस्तान
ये आगही ये ज़हानत यही तो हैं हम में
इन्हें किसी को थमा क्यूँ रहे हैं हम इंसान
— Ananth Faani















