आदी थे क्योंकि मौन के सब लोग डर गए
खुलने लगे जब आप के लब लोग डर गए
ग़फ़लत अजब थी दौर की जब रो रहे थे हम
हँसने लगे तो और ग़ज़ब लोग डर गए
तब तक तो मस्त हो के घड़े भर रहे थे सब
जाने नदी का जब ये नसब लोग डर गए
सूरज था काम था मेरा सो जल रहा था मैं
पर्वा न थी ख़बर मुझे कब लोग डर गए
पहले लहू का था न तलबगार यूँ कभी
सुन कर शजर की आज तलब लोग डर गए
दाढ़ी बड़ी सी चेहरे पे होती थी आम बात
डरता नहीं था कोई पर अब लोग डर गए
शेर-ओ-सुख़न से रब्त न 'फ़ानी' का था कोई
सुन कर सुख़नवरी का सबब लोग डर गए
— Ananth Faani















