नहीं मरेंगे नहीं सुनेंगे क़ज़ा की बातें
करो न हम जैसे काफ़िरों से ख़ुदा की बातें
सिखा रहा था रदीफ़ वाली वफ़ा मैं उस को
पर उस को करनी थी मुझ से बस क़ाफ़िया की बातें
वो आम कपड़े पहनके होगा हमीं में कोई
सुना है सुनने निकलता है वो प्रजा की बातें
गुज़रती है ब्लैक होल पर क्या बताएगा फिर
कभी मेरे दिल से कर के देखो ख़ला की बातें
वो शा'इरी हो या आशिक़ी हो सनद हमीं हैं
नहीं हैं ये कुछ सिवाए अपनी अना की बातें
उदास लोगों की आँख का नम ख़ुद इक ज़बाँ है
और इस ज़बाँ में ये बारिशें हैं घटा की बातें
— Ananth Faani















