बस इतनी सी बात कि उस की बातें अच्छी हैं
जाने कितनी बनती बातें इस से बिगड़ी हैं
सिर्फ़ इस लिए कि थक भी जाता हूँ करते करते
काफ़ी बढ़िया बातें होने से रह जाती हैं
छक्के पड़ जाते हैं अच्छी ख़ासी गेंदों पे
ऐंवई ऐंवई गेंदों पे भी विकटें गिरती हैं
अलग अलग चीज़ें हैं दाम और क़ीमत यूँ समझो
क़ीमती चीजें कितनी हैं जो सस्ती बिकती हैं
अच्छी हैं कविताएँ आप की हम ने उन से कहा
वो तो रूठ गए हम से बोले बस अच्छी हैं
शहर में ये वहशत पनपी है हम में क्या ही कहें
जंगल के वासी भी हम से कम ही जंगली हैं
मेरी क्लास के सब बच्चे ग़ज़लें भी कहने लगे
मेरी ही रचनाएँ बस अब भी तुकबंदी हैं
सुना किसी फ़ानी को महफ़िल में तो लगा मुझे
अरे अरे ये ग़ज़लें नज़्में सारी मेरी हैं















