न उपयुक्त है एक भी जब विशेषण
अपर्याप्त हैं प्रेम के सारे विवरण
महावत का हो ताल-मेल ऐसा गज से
न अंकुश हो कोई न कोई नियंत्रण
अयोध्या भी मैं और लंका भी मैं ही
है मुझ में ही राम और मुझ में ही रावण
कहाँ तुम को देता है दर्शन तुम्हारा
कहाँ सत्य कहता है कोई भी दर्पण
ये जीवन को ही काव्य रचना बना कर
किसे कर रहे हैं अनन्त इस का अर्पण
— Ananth Faani















