ख़्वाब के बीज इन्हें बोने की इजाज़त नहीं है
हैं कुछ आँखें जिन्हें सोने की इजाज़त नहीं है
है परेशान जो दुनिया से ग़ज़ल गोई करे
किसी को बैठके रोने की इजाज़त नहीं है
कोई शहर आके लपेटे में हमें ले लेगा
दश्त हैं हम हमें होने की इजाज़त नहीं है
ऐसे सामान इकट्ठा किए जाते हैं हम
जैसे कुछ भी हमें खोने की इजाज़त नहीं है
तू ने फर्से से लहू धोके नदी कर दी लाल
और मुझे हाथ भी धोने की इजाज़त नहीं है
— Ananth Faani















