हैं नहीं ख़ुद उदास आदमी हम
हाँ मगर ग़म शनास आदमी हम
उस की मर्ज़ी कभी उतार ही दे
हैं तो उस के लिबास आदमी हम
एक लेखक का प्रेम आदमी तुम
और उस की भड़ास आदमी हम
एक सहरा की प्यास आदमी तुम
एक दरिया की प्यास आदमी हम
तुम को लगते हों या न लगते हों
हम को लगते हैं ख़ास आदमी हम
हुआ करते हैं हम कभी चरख़ा
और कभी हैं कपास आदमी हम
ख़ुद को लगते हैं हम दुरुस्त हवा से
या'नी हैं बद-हवा से आदमी हम
मुख़्तलिफ़ सूरतें हैं मिट्टी की
जानवर फूल घास आदमी हम
— Ananth Faani















