मुझे भी घर बसाना चाहिए था
किसी से दिल लगाना चाहिए था
किसी से दिल लगाना चाहिए था
कई बारी किया इज़हार उस ने
मुझे भी मान जाना चाहिए था
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मुझे तकलीफ़ तो होगी मगर ख़ैर
बधाई दूँगा जिस को तुम मुबारक़
बधाई दूँगा जिस को तुम मुबारक़
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कभी तन्हाई से निकला बड़ी मुश्किल से लेकिन
हवाले हिज्र के मैं फिर दुबारा हो गया हूँ
हवाले हिज्र के मैं फिर दुबारा हो गया हूँ
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मुहब्बत से नफ़रत सी होने लगी है
किया हश्र ऐसा हमारा किसी ने
किया हश्र ऐसा हमारा किसी ने
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किसी ने किसी से रचाई थी शादी,
कहीं इश्क़ अपना भी हारा किसी ने
कहीं इश्क़ अपना भी हारा किसी ने
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अब मैं मुहब्बत करूँगा नहीं,
अब इश्क़ सच्चा कहाँ रह गया
अब इश्क़ सच्चा कहाँ रह गया
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