Dinesh Sen Shubh

Dinesh Sen Shubh

@Dinesh_Sen_Shubh

Dinesh Sen Shubh shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Dinesh Sen Shubh's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

1

Content

31

Likes

32

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

ख़ुश है तू गर दग़ा में सही ख़ुश रहे मैं भी तो चाहता हूँ यही ख़ुश रहे — Dinesh Sen Shubh
बहाना है कि रोका था हमीं ने कहो ना आप का भी मन नहीं था — Dinesh Sen Shubh
कोई लड़की मुकर जाए जो अपने वादे से हुई होगी कोई ग़लती कहीं तो तुम सेे भी — Dinesh Sen Shubh
वहीं से हार कर लौटा मुसाफ़िर जहाँ से जीत कर जाना भला था — Dinesh Sen Shubh
मैं अमानत हुआ था कितनों की बा'द में कह दिया पिया तुम ने — Dinesh Sen Shubh
खींच कर हाथ छुड़ाया तुम ने इस तरह साथ निभाया तुम ने — Dinesh Sen Shubh
आज भी है याद वो नंबर पुराना यार का बात वो है और उस में फ़ोन अब लगता नहीं — Dinesh Sen Shubh
मसअला ये नहीं है तुम आओ हाँ मगर तुम से कौन अच्छा है — Dinesh Sen Shubh
जिस्म से रूह ज्यूँ निकलती है बेटियाँ माँ के घर से जाती हैं — Dinesh Sen Shubh
इश्क़ मोहब्बत तन्हा रातें छोड़ो ना उन की बातें उन की बातें छोड़ो ना — Dinesh Sen Shubh
हम जहाँ हैं बस वहीं है हद हमारी तुम हमारे हो तो हम तक ही रहोगे — Dinesh Sen Shubh
तमाम रात निकलनी है याद करने में तमाम दिन हुई थीं कोशिशें भुलाने की — Dinesh Sen Shubh
कोई आवाज़ देता है कहीं से मगर दिखता नहीं है कौन है वो — Dinesh Sen Shubh
राधिका से भी कृष्ण बिछड़े थे तुम को लगता है तुम अकेले हो — Dinesh Sen Shubh
हो गहरी बात तो गहराई से समझा करो यारो कोई शा'इर कभी अश'आर बे-मतलब नहीं लिखता — Dinesh Sen Shubh
यहाँ कोई नहीं मरता किसी के दूर जाने से किसी के दूर जाने से यहाँ कोई नहीं मरता — Dinesh Sen Shubh
हाल क्या बेटियों का जानेंगे वो जो बेटों की चाह रखते हैं — Dinesh Sen Shubh
हमें तो उस के काँधों का सहारा बस सहारा है पिता है वो हमारा इस जहाँ में सब से प्यारा है — Dinesh Sen Shubh

Ghazal

मिरी तस्वीर में उस का न होना लगे तासीर का नुस्ख़ा न होना मियाँ मैं उस के बिन ऐसा हूँ जैसे अँगूठी में नगीने का न होना मैं इतना हो गया हूँ ग़ैर साया मिरा साया लगे मेरा न होना अदालत में गवाही दे रहा है कोई साहिल समुंदर का न होना सजी है वो मगर नाराज़ भी है है जाहिर कान में झुमका न होना यक़ीनन ये कमी उस की कमी है ज़रूरी लफ़्ज़ पे नुक़्ता न होना शिकायत इस तरह से कर रहा है मकाँ मंज़ूर है कमरा न होना वो अब मेरी तरफ़ से लड़ रहा है कभी जो चाहता मेरा न होना वो होना चाहता है आईना पर दर-ओ-दीवार पर लटका न होना तरासोगे तो ख़ुद में पा सकोगे था होना चाहिए क्या क्या न होना मिरे अपनों में तो सब दिख रहे हैं मगर अफ़सोस है उस का न होना — Dinesh Sen Shubh
किसी जर्जर 'इमारत को सहारा कौन देता है रहो नाकाम तो अवसर दुबारा कौन देता है यहाँ किस को पड़ी है कौन जीता कौन मरता है यहाँ ता- उम्र बेबस को गुज़ारा कौन देता है किसी से जब मिलो तो फ़ासला कुछ दूर का रखना नदी डूबे समुंदर में किनारा कौन देता है यहाँ उपहार भी पाने की ख़ातिर हैं दिए जाते भला मुफ़लिस को खाने को छुहारा कौन देता है अदब इंसान की 'आदत में शामिल हो ही जाती है हुए रुख़्सत को रुकने का इशारा कौन देता है यहाँ सब लोग मिट्टी से बने हैं जानते हैं सब मगर मिट्टी को उस का मोल सारा कौन देता है फ़क़त आसान है आँखों में 'शुभ' सपने सजाना भी मगर हर एक को टूटा सितारा कौन देता है — Dinesh Sen Shubh