ग़म दिसंबर की सर्द रातों का
दे रहा ख़ूब दर्द रातों का
औरतें रोईं तो दिखीं सब को
न दिखा रोता मर्द रातों का
जो रहा कल तलक फटा पन्ना
हो गया आज फ़र्द रातों का
आज का चाँद हो गया है वो
रंग जिस का था ज़र्द रातों का
वो जो करता ग़ुरूर शुभ दिन का
वो ही होता है गर्द रातों का
— Dinesh Sen Shubh















