ख़ूब-सूरत किताब लगता है
शख़्स वो ला-जवाब लगता है
उस की गर्दन के तिल कँवल जैसे
उस का चेहरा गुलाब लगता है
साथ में उस के सौ सिपाही हैं
उस का यौवन नवाब लगता है
पास उस के रहूँ तो सब अच्छा
उस के बिन सब ख़राब लगता है
उस की लहरें उफ़ान लेती हैं
वो कोई खारा आब लगता है
जब कोई हाँ में हाँ मिलाता है
सुन के अच्छा जवाब लगता है
— Dinesh Sen Shubh















