किसी को हो गया सोना मुनासिब

किसी को जागकर रोना मुनासिब

है मानो ज़िंदगी की कश्मकश में
जो पहना है वही धोना मुनासिब

जहाँ से जीत की ख़ातिर चले थे
वहीं पर हार कर होना मुनासिब

दिया इस साल मेरे रब ने इतना
जो काटा था वही बोना मुनासिब

करो ईज़ाद अब मिट्टी के ज़ेवर
सभी को है कहाँ सोना मुनासिब

मैं ख़ुश रहता हूँ बस ये सोच कर के
वही होगा जो है होना मुनासिब

— Dinesh Sen Shubh

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