दुनिया को बताने के लिए कुछ भी नहीं है
अब सुनने सुनाने के लिए कुछ भी नहीं है
अब सुनने सुनाने के लिए कुछ भी नहीं है
तस्वीर कोई तेरी, ना ही कोई निशानी
अब तुझ को भुलाने के लिए कुछ भी नहीं है
हर एक क़दम पे तो पलट कर यूँंँ न देखो
अब साथ निभाने के लिए कुछ भी नहीं हैं
जब ख़त्म हुआ क़िस्सा तो तुम पास हो आए
अब और सुनाने के लिए कुछ भी नहीं है
जब दिल ही नहीं रूह तलक ज़ख़्म भरा हो
फिर हंँसने हंँसाने के लिए कुछ भी नहीं है
इक ऐसे सफ़र पे तो निकल आए हैं खालिद
अब लौट के जाने के लिए कुछ भी नहीं है
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हमारे जनवरी के ग़म दिसंबर से ज़्यादा हैं
बता ऐ साल-ए-नौ ख़ुशियाँ मनाएं किस तरह से हम
बता ऐ साल-ए-नौ ख़ुशियाँ मनाएं किस तरह से हम
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थक चुका हूँ देख कर मैं वक़्त की रफ़्तार को
हर जगह पे हर दफ़ा तो कुछ नए किरदार को
हर जगह पे हर दफ़ा तो कुछ नए किरदार को
जब तलक ख़ामोश मैं था बोलते ही वो रहे
चुप हुए हैं अब मेरी वो देख कर गुफ़्तार को
साथ तेरे इश्क़ का भी मैं कभी करता सफ़र
पर हमें चलना पड़ा है देख कर घर-बार को
ख़ाक शायद दश्त की छानी है उस ने उम्र भर
घर समझ बैठा फ़क़त वो देख कर दीवार को
बात हक़ की आज तक करते रहें हैं हर जगह
लफ्ज़ हम बदले नहीं हैं देख कर दरबार को
फ़ैसला मैदान का मंज़ूर है हर हाल में
हम कहाँ डरते कभी हैं देख कर सालार को
अब ग़ज़ल में दर्द की तासीर ख़ालिद कम करो
सब के सब तो रो रहे सुन के अब अश’आर को
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तुम्हारी याद तुम्हारे ख़याल का मौसम
हमारे दिल में है उतरा कमाल का मौसम
हमारे दिल में है उतरा कमाल का मौसम
फ़लक के चाँद का भी रंग फीका पड़ जाए
अयाँ जो हो कभी तेरे जमाल का मौसम
तो अब की इश्क़ में तासीर बढ़ने वाली है
हुआ है ख़त्म जो ये ख़द-वो-ख़ाल का मौसम
बिछड़ते वक़्त जो मैं ने सबब नहीं पूछा
तमाम उम्र रहा फिर मलाल का मौसम
कभी मैं भूल के ख़ुद पे ग़ुरूर कर बैठा
शुरू तभी से है मेरे ज़वाल का मौसम
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ख़ाली जेब ही सब से भारी होती है
चलने में कितनी दुश्वारी होती है
चलने में कितनी दुश्वारी होती है
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महफिल में भी तन्हाई ने घेरा है
या'नी अंदर से मैं कितना ख़ाली हूँ
या'नी अंदर से मैं कितना ख़ाली हूँ
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