Khalid Azad

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    सबकी उम्मीदों को हार के देखो तुम
    कितना मुश्किल फिर सांँसों को ढोना है
    Khalid Azad
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    दुनिया को बताने के लिए कुछ भी नहीं है
    अब सुनने सुनाने के लिए कुछ भी नहीं है

    तस्वीर कोई तेरी, ना ही कोई निशानी
    अब तुझको भुलाने के लिए कुछ भी नहीं है

    हर एक क़दम पे तो पलट कर यूंँ न देखो
    अब साथ निभाने के लिए कुछ भी नहीं हैं

    जब ख़त्म हुआ क़िस्सा तो तुम पास हो आए
    अब और सुनाने के लिए कुछ भी नहीं है

    जब दिल ही नहीं रूह तलक ज़ख़्म भरा हो
    फिर हंँसने हंँसाने के लिए कुछ भी नहीं है

    इक ऐसे सफ़र पे तो निकल आए हैं खालिद
    अब लौट के जाने के लिए कुछ भी नहीं है
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    Khalid Azad
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    कितना अजीब है ये मोहब्बत का खेल भी
    हम हार कर भी इसमें कई रोज़ ख़ुश रहे
    Khalid Azad
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    ज़िंदगी से गर हमें थोड़ी बहुत मोहलत मिली
    बैठ कर है सोचना किस बात की उजरत मिली
    Khalid Azad
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    हमारे जनवरी के ग़म दिसंबर से ज़्यादा हैं
    बता ऐ साल-ए-नौ ख़ुशियाँ मनाएं किस तरह से हम
    Khalid Azad
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    थक चुका हूँ देख कर मैं वक़्त की रफ़्तार को
    हर जगह पे हर दफ़ा तो कुछ नए किरदार को

    जब तलक ख़ामोश मैं था बोलते ही वो रहे
    चुप हुए हैं अब मेरी वो देख कर गुफ़्तार को

    साथ तेरे इश्क़ का भी मैं कभी करता सफ़र
    पर हमें चलना पड़ा है देख कर घर-बार को

    ख़ाक शायद दश्त की छानी है उसने उम्र भर
    घर समझ बैठा फक़त वो देख कर दीवार को

    बात हक़ की आज तक करते रहें हैं हर जगह
    लफ्ज़ हम बदले नहीं हैं देख कर दरबार को

    फ़ैसला मैदान का मंजूर है हर हाल में
    हम कहां डरते कभी हैं देख कर सालार को

    अब ग़ज़ल में दर्द की तासीर ख़ालिद कम करो
    सब के सब तो रो रहे सुन के अब अश’आर को
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    Khalid Azad
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    तुम्हारी याद तुम्हारे ख़्याल का मौसम
    हमारे दिल में है उतरा कमाल का मौसम

    फ़लक के चाँद का भी रंग फीका पड़ जाए
    अयाँ जो हो कभी तेरे जमाल का मौसम

    तो अब की इश्क़ में तासीर बढ़ने वाली है
    हुआ है ख़त्म जो ये ख़द-वो-ख़ाल का मौसम

    बिछड़ते वक़्त जो मैंने सबब नहीं पूछा
    तमाम उम्र रहा फिर मलाल का मौसम

    कभी मैं भूल के ख़ुद पे ग़ुरूर कर बैठा
    शुरू तभी से है मेरे ज़वाल का मौसम
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    जिन के दिन भी उदास हो ख़ालिद
    वो तो रातों को मर ही जाएँगे
    Khalid Azad
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    ख़ाली जेब ही सब से भारी होती है
    चलने में कितनी दुश्वारी होती है
    Khalid Azad
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    महफिल में भी तन्हाई ने घेरा है
    यानी अंदर से मैं कितना खाली हूँ
    Khalid Azad
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