अज़ल से तो अबद तक है गुज़ारे का सहारा दुख
ख़ुदा ने साथ आदम के उतारा है ये सारा दुख
इसी डर से किसी ग़म का मनाया ही नहीं मातम
ज़माना ये न समझे फिर अभी तक है तुम्हारा दुख
सभी के साथ बांँटी है हमेशा हर ख़ुशी हमने
मगर हमने तो तन्हा ही शबों में है गुज़ारा दुख
जहाँँ पर इज्ज़त-ए-नफ़सी से बढ़कर कुछ नहीं होता
वहाँँ समझे कोई कैसे तुम्हारा दुख हमारा दुख
अभी आग़ाज़-ए-उल्फ़त है अभी मुमकिन पलटना है
वगरना तुम भी चीख़ोगे हमारा दुख हमारा दुख
मुहब्बत के सफ़ीने तो ग़मों से पार होते हैं
वही साहिल पे उतरेगा है जिस का बस किनारा दुख
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