ख़ूब से ख़ूब तर नहीं होता
कोई जब दर-बदर नहीं होता
रास्तों पे ठहर तो जाता है
पर मुसाफ़िर का घर नहीं होता
बारहा उस तरफ़ चले लेकिन
उसकी जानिब सफ़र नहीं होता
ख़्वाब को बेचना है मजबूरी
साथ इसके गुज़र नहीं होता
अपना सब कुछ लुटा चुका हो जो
फिर उसे कोई डर नहीं होता
याद कब तक करोगे तुम ख़ालिद
क़िस्सा क्यूँ मुख़्तसर नहीं होता
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