bikhar chuka hooñ tere paas tak main aane men | बिखर चुका हूँ तेरे पास तक, मैं आने में

  - Khalid Azad

बिखर चुका हूँ तेरे पास तक, मैं आने में
कभी किया था जो वा'दा उसे निभाने में

कोई ख़बर तो उन्हे दो की मुंतज़िर हैं हम
तमाम 'उम्र है गुज़री जिन्हें बुलाने में

सुकून दिल को इसी बात पे तो आता है
मैं याद आता हूँ उनको, मगर भुलाने में

तमाम 'उम्र निभाने की ही सज़ा ये है
वो काँटे छोड़ गया फूल ले के जाने में

लुटा चुका हूँ मैं सब कुछ उसी की चाहत में
लुटेगी जान भी इक दिन उसे भुलाने में

किसी के सामने इतना झुको न तुम 'ख़ालिद'
कि सर बचे ही न दस्तार को बचाने में

  - Khalid Azad

Wada Shayari

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