ज़िंदगी किस लिए गुमान में है
चंद ही रोज़ इस मकान में है
जाते जाते लकीर खींच गया
कुछ इशारा इसी निशान में है
रात, तन्हाई और तेरा ग़म
'उम्र इसके ही दरमियान में है
फ़ैसला किस तरह क़ुबूल करूँँ
साफ़-गोई कहाँ बयान में है
सबको फ़रहाद याद रहता है
एक मांझी भी दास्तान में है
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