aql saari ki saari thikaane lagii | अक़्ल सारी की सारी ठिकाने लगी

  - Khalid Azad

अक़्ल सारी की सारी ठिकाने लगी
ज़िंदगी फ़ैसला जब सुनाने लगी

'उम्र भर का था वा'दा चलेंगे, मगर
चंद क़दमों में ही डगमगाने लगी

अब तेरा हिज्र कैसे मैं काटूं बता
तेरी तस्वीर भी मुंह छुपाने लगी

कल की बातें उन्हें याद होंगी भला
मां यही सोच पत्थर पकाने लगी

'उम्र ऐसी कटी है ग़मों में मेरी
मौत आई तरस मुझ पे खाने लगी

सारे रिश्तों का खा़लिद भरम खुल गया
ज़िंदगी जब हमें आज़माने लगी

  - Khalid Azad

Justice Shayari

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