अक़्ल सारी की सारी ठिकाने लगी
ज़िंदगी फ़ैसला जब सुनाने लगी
'उम्र भर का था वा'दा चलेंगे, मगर
चंद क़दमों में ही डगमगाने लगी
अब तेरा हिज्र कैसे मैं काटूं बता
तेरी तस्वीर भी मुंह छुपाने लगी
कल की बातें उन्हें याद होंगी भला
मां यही सोच पत्थर पकाने लगी
'उम्र ऐसी कटी है ग़मों में मेरी
मौत आई तरस मुझ पे खाने लगी
सारे रिश्तों का खा़लिद भरम खुल गया
ज़िंदगी जब हमें आज़माने लगी
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Khalid Azad
our suggestion based on Khalid Azad
As you were reading Justice Shayari Shayari