लौटेंगे अब वो गुज़रे ज़माने, नहीं नहीं
आँखों को अब वो ख़्वाब दिखाने, नहीं नहीं
शायद कि उसके लब पे तबस्सुम की है घटा
मौसम कभी ये वरना सुहाने, नहीं नहीं
इस बात पे ख़फ़ा हैं मनाने नहीं गए
तुम भी थे आए हमको मनाने, नहीं नहीं
कुछ भी सबक़ ये लेते जो मजनू को देख कर
सहरा में आते फिर ये दिवाने, नहीं नहीं
यादों में आते जाते हैं सारे के सारे अब
लेकिन वो घर में यार पुराने, नहीं नहीं
बाज़ार-ए-मिस्र आज भी आबाद हैं मगर
यूसुफ के जैसे अब वो ख़ज़ाने, नहीं नहीं
ग़म की तलब है मुझको कि अब चैन कुछ मिले
ख़ुशियों के अब ये बार उठाने, नहीं नहीं
ख़ालिद जो ज़िक्र आए कभी उस हसीन का
ऐसे कोई भी शे'र सुनाने नहीं नहीं
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