khoon-e-dil jab bhi nikala to ghazal kah daali | ख़ून-ए-दिल जब भी निकाला तो ग़ज़ल कह डाली

  - Khalid Azad

ख़ून-ए-दिल जब भी निकाला तो ग़ज़ल कह डाली
ज़ब्त जब तेरा संभाला तो ग़ज़ल कह डाली

मुदद्तों तक तेरी यादों पे लगा था पहरा
जब हटा दिल से ये जाला तो ग़ज़ल कह डाली

ऐसी तारीकी में गुज़री हैं हमारी रातें
दूर जब देखा उजाला तो ग़ज़ल कह डाली

हम से मयकश पे खुले तब ये नज़ारे सारे
जाम साक़ी ने उछाला तो ग़ज़ल कह डाली

जब वो कूचे से कभी निकले फ़क़त शे'र कहे
उसने जब हम को निकाला तो ग़ज़ल कह डाली

मैंने बस हुस्न वो मोहब्बत पे नहीं लिखनी है
मुँह से छिन जाए निवाला तो ग़ज़ल कह डाली

  - Khalid Azad

Chehra Shayari

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