अपनी क़ीमत लगा के देखूँगा
मैं भी बाज़ार जा के देखूँगा
अब वो शायद पलट के आ जाए
इक दफ़ा फिर बुला के देखूँगा
वहशतों का उरूज क्या होगा
मैं दियों को बुझा के देखूँगा
कितना बचता हूँ तेरी ख़ातिर मैं
ख़ुद से ख़ुद को घटा के देखूँगा
— Khalid Azad
मैं भी बाज़ार जा के देखूँगा
अब वो शायद पलट के आ जाए
इक दफ़ा फिर बुला के देखूँगा
वहशतों का उरूज क्या होगा
मैं दियों को बुझा के देखूँगा
कितना बचता हूँ तेरी ख़ातिर मैं
ख़ुद से ख़ुद को घटा के देखूँगा
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