KHud ko yoon mubtila sa rakhna hai | ख़ुद को यूँं मुब्तिला सा रखना है

  - Khalid Azad

ख़ुद को यूँं मुब्तिला सा रखना है
तुम से कुछ सिलसिला सा रखना है

तुम को आना नहीं है मिलने पर
दर को अपने खुला सा रखना है

कोई मुश्किल नहीं है तेरा ग़म
दिल को बस हौसला सा रखना है

आ भी जाओ कज़ा से पहले तुम
ऐसे में क्या गिला सा रखना है

यादें तेरी हो मेरे रस्ते पर
अब तो ये क़ाफिला सा रखना है

अब तेरा ग़म छुपाना है हंस कर
अब तो ये मशग़ला सा रखना है

  - Khalid Azad

Ummeed Shayari

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