toot ke kis tarah bikhar jaaun | टूट के किस तरह बिखर जाऊँ

  - Khalid Azad

टूट के किस तरह बिखर जाऊँ
ऐसे हालात में किधर जाऊँ

तीरगी यूँँ बसी है आँखों में
ख़ुद की परछाई से भी डर जाऊँ

दूर इतना मैं आ चुका हूँ अब
सोचता हूँ कि कैसे घर जाऊँ

रास्ता ख़ुद-ब-ख़ुद ही चलता है
ये अलग बात मैं ठहर जाऊँ

फिर बुलंदी पे जा के क्या हासिल
उसके दिल से ही गर उतर जाऊँ

दिल की आख़िर यही तमन्ना है
तेरे कूचे से अब गुज़र जाऊँ

एक उसकी दुआ से ही ख़ालिद
क्या पता डूब कर उभर जाऊँ

  - Khalid Azad

Dar Shayari

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