ख़ुद अपने ज़ख़्म को गहरा बना के क्या हासिल
अब उसके चेहरे का नक़्शा बना के क्या हासिल
ये माना हिज्र की वहशत तो दिल में है मेरे
अभी से जिस्म को लाशा बना के क्या हासिल
किसी के ख़्वाब भी आते नहीं हैं रातों में
तो अब ये चाँद भी पूरा बना के क्या हासिल
बस एक झटके में लहरें उजाड़ बैठेंगी
यही है डर तो घरौंदा बना के क्या हासिल
ठहरना इनके मुक़द्द़र में ही नहीं शायद
किसी परिंद को अपना बना के क्या हासिल
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