रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं
कल मैं जब जाने लगा तो उस ने क्यूँँ रोका नहीं
यूँँ अगर सोचूँ तो इक इक नक़्श है सीने पे नक़्श
हाए वो चेहरा कि फिर भी आँख में बनता नहीं
क्यूँँ उड़ाती फिर रही है दर-ब-दर मुझ को हवा
मैं अगर इक शाख़ से टूटा हुआ पत्ता नहीं
आज तन्हा हूँ तो कितना अजनबी माहौल है
एक भी रस्ते ने तेरे शहर में रोका नहीं
हर्फ़ बर्ग-ए-ख़ुश्क बन कर टूटते गिरते रहे
ग़ुंचा-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना होंट पर फूटा नहीं
दर्द का रस्ता है या है साअ'त-ए-रोज़-ए-हिसाब
सैकड़ों लोगों को रोका एक भी ठहरा नहीं
शबनमी आँखों के जुगनू काँपते होंटों के फूल
एक लम्हा था जो 'अमजद' आज तक गुज़रा नहीं
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