Amjad Islam Amjad

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Amjad Islam Amjad shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Amjad Islam Amjad's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वो जो गीत तुम ने सुना नहीं मेरी उम्र भर का रियाज़ था मेरे दर्द की थी वो दास्ताँ जिसे तुम हँसी में उड़ा गए — Amjad Islam Amjad
सवाल ये है कि आपस में हम मिलें कैसे हमेशा साथ तो चलते हैं दो किनारे भी — Amjad Islam Amjad
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा — Amjad Islam Amjad
वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा — Amjad Islam Amjad
जिस तरफ़ तू है उधर होंगी सभी की नज़रें ईद के चाँद का दीदार बहाना ही सही — Amjad Islam Amjad

Ghazal

अब तक न खुल सका कि मेरे रू-ब-रू है कौन किस से मुकालमा है पस-ए-गुफ़्तगू है कौन साया अगर है वो तो है उस का बदन कहाँ मरकज़ अगर हूँ मैं तो मेरे चार-सू है कौन हर शय की माहियत पे जो करता है तू सवाल तुझ से अगर ये पूछ ले कोई कि तू है कौन अश्कों में झिलमिलाता हुआ किस का अक्स है तारों की रह-गुज़ार में ये माह-रू है कौन बाहर कभी तो झाँक के खिड़की से देखते किस को पुकारता हुआ ये कू-ब-कू है कौन आँखों में रात आ गई लेकिन नहीं खुला मैं किस का मुद्द'आ हूँ मेरी जुस्तजू है कौन किस की निगाह-ए-लुत्फ़ ने मौसम बदल दिए फ़स्ल-ए ख़िज़ाँ की राह में ये मुश्क-बू है कौन बादल की ओट से कभी तारों की आड़ से छुप छुप के देखता हुआ ये हीला-जू है कौन तारे हैं आसमान में जैसे ज़मीं पे लोग हर-चंद एक से हैं मगर हू-ब-हू है कौन होना तो चाहिए कि ये मेरा ही अक्स हो लेकिन ये आईने में मेरे रू-ब-रू है कौन इस बे-किनार फैली हुई काइ‌नात में किस को ख़बर है कौन हूँ मैं और तू है कौन सारा फ़साद बढ़ती हुई ख़्वाहिशों का है दिल से बड़ा जहान में 'अमजद' अदू है कौन — Amjad Islam Amjad
भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा इस अदू-ए-जाँ को 'अमजद' मैं बुरा कैसे कहूँ जब भी आया सामने वो बे-वफ़ा अच्छा लगा — Amjad Islam Amjad
ये गर्द-बाद-ए-तमन्ना में घूमते हुए दिन कहाँ पे जा के रुकेंगे ये भागते हुए दिन ग़ुरूब होते गए रात के अँधेरों में नवेद-ए-अम्न के सूरज को ढूँडते हुए दिन न जाने कौन ख़ला के ये इस्तिआरे हैं तुम्हारे हिज्र की गलियों में गूँजते हुए दिन न आप चलते न देते हैं रास्ता हम को थकी थकी सी ये शा में ये ऊँघते हुए दिन फिर आज कैसे कटेगी पहाड़ जैसी रात गुज़र गया है यही बात सोचते हुए दिन तमाम उम्र मिरे साथ साथ चलते रहे तुम्हीं को ढूँडते तुम को पुकारते हुए दिन हर एक रात जो तामीर फिर से होती है कटेगा फिर वही दीवार चाटते हुए दिन मिरे क़रीब से गुज़रे हैं बार-हा 'अमजद' किसी के वस्ल के वादे को देखते हुए दिन — Amjad Islam Amjad
दाम-ए-ख़ुशबू में गिरफ़्तार सबा है कब से लफ़्ज़ इज़हार की उलझन में पड़ा है कब से ऐ कड़ी चुप के दर ओ बाम सजाने वाले मुंतज़िर कोई सर-ए-कोह-ए-निदा है कब से चाँद भी मेरी तरह हुस्न-शनासा निकला उस की दीवार पे हैरान खड़ा है कब से बात करता हूँ तो लफ़्ज़ों से महक आती है कोई अन्फ़ास के पर्दे में छुपा है कब से शोबदा-बाज़ी-ए-आईना-ए-एहसास न पूछ हैरत-ए-चश्म वही शोख़ क़बा है कब से देखिए ख़ून की बरसात कहाँ होती है शहर पर छाई हुई सुर्ख़ घटा है कब से कोर-चश्मों के लिए आईना-ख़ाना मालूम वर्ना हर ज़र्रा तिरा अक्स-नुमा है कब से खोज में किस की भरा शहर लगा है 'अमजद' ढूँडती किस को सर-ए-दश्त हवा है कब से — Amjad Islam Amjad
न आसमाँ से न दुश्मन के ज़ोर ओ ज़र से हुआ ये मोजज़ा तो मिरे दस्त-ए-बे-हुनर से हुआ क़दम उठा है तो पाँव तले ज़मीं ही नहीं सफ़र का रंज हमें ख़्वाहिश-ए-सफ़र से हुआ मैं भीग भीग गया आरज़ू की बारिश में वो अक्स अक्स में तक़्सीम चश्म-ए-तर से हुआ सियाही शब की न चेहरों पे आ गई हो कहीं सहर का ख़ौफ़ हमें आईनों के डर से हुआ कोई चले तो ज़मीं साथ साथ चलती है ये राज़ हम पे अयाँ गर्द-ए-रहगुज़र से हुआ तिरे बदन की महक ही न थी तो क्या रुकते गुज़र हमारा कई बार यूँँ तो घर से हुआ कहाँ पे सोए थे 'अमजद' कहाँ खुलीं आँखें गुमाँ क़फ़स का हमें अपने बाम-ओ-दर से हुआ — Amjad Islam Amjad
कमाल-ए-हुस्न है हुस्न-ए-कमाल से बाहर अज़ल का रंग है जैसे मिसाल से बाहर तो फिर वो कौन है जो मावरा है हर शय से नहीं है कुछ भी यहाँ गर ख़याल से बाहर ये काएनात सरापा जवाब है जिस का वो इक सवाल है फिर भी सवाल से बाहर है याद अहल-ए-वतन यूँँ कि रेग-ए-साहिल पर गिरी हुई कोई मछली हो जाल से बाहर अजीब सिलसिला-ए-रंग है तमन्ना भी हद-ए-उरूज से आगे ज़वाल है बाहर न उस का अंत है कोई न इस्तिआ'रा है ये दास्तान है हिज्र-ओ-विसाल से बाहर दुआ बुज़ुर्गों की रखती है ज़ख़्म उल्फ़त को किसी इलाज किसी इंदिमाल से बाहर बयाँ हो किस तरह वो कैफ़ियत कि है 'अमजद' मिरी तलब से फ़रावाँ मजाल से बाहर — Amjad Islam Amjad
एक आज़ार हुई जाती है शोहरत हम को ख़ुद से मिलने की भी मिलती नहीं फ़ुर्सत हम को रौशनी का ये मुसाफ़िर है रह-ए-जाँ का नहीं अपने साए से भी होने लगी वहशत हम को आँख अब किस से तहय्युर का तमाशा माँगे अपने होने पे भी होती नहीं हैरत हम को अब के उम्मीद के शो'ले से भी आँखें न जलीं जाने किस मोड़ पे ले आई मोहब्बत हम को कौन सी रुत है ज़माने में हमें क्या मालूम अपने दामन में लिए फिरती है हसरत हम को ज़ख़्म ये वस्ल के मरहम से भी शायद न भरे हिज्र में ऐसी मिली अब के मसाफ़त हम को दाग़-ए-इस्याँ तो किसी तौर न छुपते 'अमजद' ढाँप लेती न अगर चादर-ए-रहमत हम को — Amjad Islam Amjad
निकल के हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहरस जाएँ कहीं ज़मीं के साथ न मिल जाएँ ये ख़लाएँ कहीं सफ़र की रात है पिछली कहानियाँ न कहो रुतों के साथ पलटती हैं कब हवाएँ कहीं फ़ज़ा में तैरते रहते हैं नक़्श से क्या क्या मुझे तलाश न करती हों ये बलाएँ कहीं हवा है तेज़ चराग़-ए-वफ़ा का ज़िक्र तो क्या तनाबें ख़ेमा-ए-जाँ की न टूट जाएँ कहीं मैं ओस बन के गुल-ए-हर्फ़ पर चमकता हूँ निकलने वाला है सूरज मुझे छुपाएँ कहीं मिरे वजूद पे उतरी हैं लफ़्ज़ की सूरत भटक रही थीं ख़लाओं में ये सदाएँ कहीं हवा का लम्स है पाँव में बेड़ियों की तरह शफ़क़ की आँच से आँखें पिघल न जाएँ कहीं रुका हुआ है सितारों का कारवाँ 'अमजद' चराग़ अपने लहू से ही अब जलाएँ कहीं — Amjad Islam Amjad