बंद था दरवाज़ा भी और अगर में भी तन्हा था मैं

वहम था जाने मिरा या आप ही बोला था में

याद है अब तक मुझे वो बद-हवा सेी का समाँ
तेरे पहले ख़त को घंटों चूमता रहता था मैं

रास्तों पर तीरगी की ये फ़रावानी न थी
इस से पहले भी तुम्हारे शहर में आया था मैं

मेरी उँगली पर हैं अब तक मेरे दाँतों के निशाँ
ख़्वाब ही लगता है फिर भी जिस जगह बैठा था मैं

आज 'अमजद' वहम है मेरे लिए जिस का वजूद
कल उसी का हाथ था
में घूमता फिरता था मैं

— Amjad Islam Amjad

More by Amjad Islam Amjad

Other ghazal from the same pen

See all from Amjad Islam Amjad →

Gaon Shayari

Shers of gaon.

All Gaon Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling