तारा तारा उतर रही है रात समुंदर में
जैसे डूबने वालों के हों हाथ समुंदर में
साहिल पर तो सब के होंगे अपने अपने लोग
रह जाएगी कश्ती की हर बात समुंदर में
एक नज़र देखा था उस ने आगे याद नहीं
खुल जाती है दरिया की औक़ात समुंदर में
मैं साहिल से लौट आया था कश्ती चलने पर
पिघल चुकी थी लेकिन मेरी ज़ात समुंदर में
काट रहा हूँ ऐसे 'अमजद' ये हस्ती की रह
बे-पतवारी नाव पे जैसे रात समुंदर में
— Amjad Islam Amjad















