sawaal ye hai ki aapas mein ham milen kaise | सवाल ये है कि आपस में हम मिलें कैसे

  - Amjad Islam Amjad

सवाल ये है कि आपस में हम मिलें कैसे
हमेशा साथ तो चलते हैं दो किनारे भी

  - Amjad Islam Amjad

Rahbar Shayari

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    अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
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    तू पूछता है मुझ से भला क्या बदल गया

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    अब उस के बात चीत का लहजा बदल गया

    क़ुर्बत में उस के अच्छे से अच्छे बदल गए
    जो मैं भी उस के पास जा बैठा बदल गया

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    फिर एक रोज़ उस का इरादा बदल गया

    लैला बदल गई तो गई साथ साथ ही
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    मैं जिस के साथ कई दिन गुज़ार आया हूँ
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As you were reading Shayari by Amjad Islam Amjad

    ये जो हासिल हमें हर शय की फ़रावानी है
    ये भी तो अपनी जगह एक परेशानी है

    ज़िंदगी का ही नहीं ठोर-ठिकाना मालूम
    मौत तो तय है कि किस वक़्त कहाँ आनी है

    कोई करता ही नहीं ज़िक्र वफ़ादारी का
    इन दिनों इश्क़ में आसानी ही आसानी है

    कब ये सोचा था कभी दोस्त कि यूँ भी होगा
    तेरी सूरत तिरी आवाज़ से पहचानी है

    चैन लेने ही नहीं देती किसी पल मुझ को
    रोज़-ए-अव्वल से मिरे साथ जो हैरानी है

    ये भी मुमकिन है कि आबादी हो इस से आगे
    ये जो ता-हद्द-ए-नज़र फैलती वीरानी है

    क्यूँ सितारे हैं कहीं और कहीं आँसू हैं
    आँख वालों ने यही रम्ज़ नहीं जानी है

    तख़्त से तख़्ता बहुत दूर नहीं होता है
    बस यही बात हमें आप को बतलानी है

    दोस्त की बज़्म ही वो बज़्म है 'अमजद' कि जहाँ
    अक़्ल को साथ में रखना बड़ी नादानी है
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    Amjad Islam Amjad
    अब तक न खुल सका कि मेरे रू-ब-रू है कौन
    किस से मुकालमा है पस-ए-गुफ़्तगू है कौन

    साया अगर है वो तो है उस का बदन कहाँ
    मरकज़ अगर हूँ मैं तो मेरे चार-सू है कौन

    हर शय की माहियत पे जो करता है तू सवाल
    तुझ से अगर ये पूछ ले कोई कि तू है कौन

    अश्कों में झिलमिलाता हुआ किस का अक्स है
    तारों की रह-गुज़ार में ये माह-रू है कौन

    बाहर कभी तो झाँक के खिड़की से देखते
    किस को पुकारता हुआ ये कू-ब-कू है कौन

    आँखों में रात आ गई लेकिन नहीं खुला
    मैं किस का मुद्द'आ हूँ मेरी जुस्तजू है कौन

    किस की निगाह-ए-लुत्फ़ ने मौसम बदल दिए
    फ़स्ल-ए ख़िज़ाँ की राह में ये मुश्क-बू है कौन

    बादल की ओट से कभी तारों की आड़ से
    छुप छुप के देखता हुआ ये हीला-जू है कौन

    तारे हैं आसमान में जैसे ज़मीं पे लोग
    हर-चंद एक से हैं मगर हू-ब-हू है कौन

    होना तो चाहिए कि ये मेरा ही अक्स हो
    लेकिन ये आईने में मेरे रू-ब-रू है कौन

    इस बे-किनार फैली हुई कायनात में
    किस को ख़बर है कौन हूँ मैं और तू है कौन

    सारा फ़साद बढ़ती हुई ख़्वाहिशों का है
    दिल से बड़ा जहान में 'अमजद' अदू है कौन
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    Amjad Islam Amjad
    बस्तियों में इक सदा-ए-बे-सदा रह जाएगी
    बाम ओ दर पे नक़्श तहरीर-ए-हवा रह जाएगी

    आँसुओं का रिज़्क़ होंगी बे-नतीजा चाहतें
    ख़ुश्क होंटों पर लरज़ती इक दुआ रह जाएगी

    रू-ब-रू मंज़र न हों तो आईने किस काम के
    हम नहीं होंगे तो दुनिया गर्द-ए-पा रह जाएगी

    ख़्वाब के नश्शे में झुकती जाएगी चश्म-ए-क़मर
    रात की आँखों में फैली इल्तिजा रह जाएगी

    बे-समर पेड़ों को चूमेंगे सबा के सब्ज़ लब
    देख लेना ये ख़िज़ाँ बे-दस्त-ओ-पा रह जाएगी
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    Amjad Islam Amjad
    आईनों में अक्स न हों तो हैरत रहती है
    जैसे ख़ाली आँखों में भी वहशत रहती है

    हर दम दुनिया के हंगामे घेरे रखते थे
    जब से तेरे ध्यान लगे हैं फ़ुर्सत रहती है

    करनी है तो खुल के करो इंकार-ए-वफ़ा की बात
    बात अधूरी रह जाए तो हसरत रहती है

    शहर-ए-सुख़न में ऐसा कुछ कर इज़्ज़त बन जाए
    सब कुछ मिट्टी हो जाता है इज़्ज़त रहती है

    बनते बनते ढह जाती है दिल की हर तामीर
    ख़्वाहिश के बहरूप में शायद क़िस्मत रहती है

    साए लरज़ते रहते हैं शहरों की गलियों में
    रहते थे इंसान जहाँ अब दहशत रहती है

    मौसम कोई ख़ुशबू ले कर आते जाते हैं
    क्या क्या हम को रात गए तक वहशत रहती है

    ध्यान में मेला सा लगता है बीती यादों का
    अक्सर उस के ग़म से दिल की सोहबत रहती है

    फूलों की तख़्ती पर जैसे रंगों की तहरीर
    लौह-ए-सुख़न पर ऐसे 'अमजद' शोहरत रहती है
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    Amjad Islam Amjad
    सदियाँ जिन में ज़िंदा हों वो सच भी मरने लगते हैं
    धूप आँखों तक आ जाए तो ख़्वाब बिखरने लगते हैं

    इंसानों के रूप में जिस दम साए भटकें सड़कों पर
    ख़्वाबों से दिल चेहरों से आईने डरने लगते हैं

    क्या हो जाता है इन हँसते जीते जागते लोगों को
    बैठे बैठे क्यूँ ये ख़ुद से बातें करने लगते हैं

    इश्क़ की अपनी ही रस्में हैं दोस्त की ख़ातिर हाथों में
    जीतने वाले पत्ते भी हों फिर भी हरने लगते हैं

    देखे हुए वो सारे मंज़र नए नए दिखलाई दें
    ढलती उम्र की सीढ़ी से जब लोग उतरने लगते हैं

    बेदारी आसान नहीं है आँखें खुलते ही 'अमजद'
    क़दम क़दम हम सपनों के जुर्माने भरने लगते हैं
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    Amjad Islam Amjad

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