jis taraf tu hai udhar hongi sabhi ki nazrein | जिस तरफ़ तू है उधर होंगी सभी की नज़रें

  - Amjad Islam Amjad

जिस तरफ़ तू है उधर होंगी सभी की नज़रें
ईद के चाँद का दीदार बहाना ही सही

  - Amjad Islam Amjad

Deedar Shayari

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    ये कैसी इश्तियाक़-ए-दीद है मेरी निग़ाहों की
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    यही बहुत है कि दिल उसको ढूँढ लाया है
    किसी के साथ सही वो नज़र तो आया है

    करूँ शिकायतें तकता रहूँ कि प्यार करूँ
    गई बहार की सूरत वो लौट आया है

    वो सामने था मगर ये यक़ीं न आता था
    वो आप हैं कि मेरी ख़्वाहिशों का साया है

    अज़ाब धूप के कैसे हैं बारिशें क्या हैं
    फ़सील-ए-जिस्म गिरी जब तो होश आया है

    मैं क्या करूँगा अगर वो न मिल सका 'अमजद'
    अभी अभी मेरे दिल में ख़याल आया है
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    Amjad Islam Amjad
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    थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी
    पर अपना खेल दिखाते रहे सितारे भी

    ये ज़िंदगी है यहाँ इस तरह ही होता है
    सभी ने बोझ से लादे हैं कुछ उतारे भी

    सवाल ये है कि आपस में हम मिलें कैसे
    हमेशा साथ तो चलते हैं दो किनारे भी

    किसी का अपना मोहब्बत में कुछ नहीं होता
    कि मुश्तरक हैं यहाँ सूद भी ख़सारे भी

    बिगाड़ पर है जो तन्क़ीद सब बजा लेकिन
    तुम्हारे हिस्से के जो काम थे सँवारे भी

    बड़े सुकून से डूबे थे डूबने वाले
    जो साहिलों पे खड़े थे बहुत पुकारे भी

    प जैसे रेल में दो अजनबी मुसाफ़िर हों
    सफ़र में साथ रहे यूँ तो हम तुम्हारे भी

    यही सही तिरी मर्ज़ी समझ न पाए हम
    ख़ुदा गवाह कि मुबहम थे कुछ इशारे भी

    यही तो एक हवाला है मेरे होने का
    यही गिराती है मुझ को यही उतारे भी

    इसी ज़मीन में इक दिन मुझे भी सोना है
    इसी ज़मीं की अमानत हैं मेरे प्यारे भी

    वो अब जो देख के पहचानते नहीं 'अमजद'
    है कल की बात ये लगते थे कुछ हमारे भी
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    Amjad Islam Amjad
    किसी की आँख में ख़ुद को तलाश करना है
    फिर उस के ब'अद हमें आइनों से डरना है

    फ़लक की बंद गली के फ़क़ीर हैं तारे!
    कि घूम फिर के यहीं से उन्हें गुज़रना है

    जो ज़िंदगी थी मिरी जान! तेरे साथ गई
    बस अब तो उम्र के नक़्शे में वक़्त भरना है

    जो तुम चलो तो अभी दो क़दम में कट जाए
    जो फ़ासला मुझे सदियों में पार करना है

    तो क्यूँ न आज यहीं पर क़याम हो जाए
    कि शब क़रीब है आख़िर कहीं ठहरना है

    वो मेरा सैल-ए-तलब हो कि तेरी रानाई
    चढ़ा है जो भी समुंदर उसे उतरना है

    सहर हुई तो सितारों ने मूँद लीं आँखें
    वो क्या करें कि जिन्हें इंतिज़ार करना है

    ये ख़्वाब है कि हक़ीक़त ख़बर नहीं 'अमजद'
    मगर है जीना यहीं पर यहीं पे मरना है
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    Amjad Islam Amjad
    लहू में रंग लहराने लगे हैं
    ज़माने ख़ुद को दोहराने लगे हैं

    परों में ले के बे-हासिल उड़ानें
    परिंदे लौट कर आने लगे हैं

    कहाँ है क़ाफ़िला बाद-ए-सबा का
    दिलों के फूल मुरझाने लगे हैं

    खुले जो हम-नशीनों के गरेबाँ
    ख़ुद अपने ज़ख़्म अफ़्साने लगे हैं

    कुछ ऐसा दर्द था बाँग-ए-जरस में
    सफ़र से क़ब्ल पछताने लगे हैं

    कुछ ऐसी बे-यक़ीनी थी फ़ज़ा में
    जो अपने थे वो बेगाने लगे हैं

    हवा का रंग नीला हो रहा है
    चमन में साँप लहराने लगे हैं

    फ़लक के खेत में खिलते सितारे
    ज़मीं पर आग बरसाने लगे हैं

    लब-ए-ज़ंजीर है ता'बीर जिन की
    वो सपने फिर नज़र आने लगे हैं

    खुला है रात का तारीक जंगल
    और अंधे राह दिखलाने लगे हैं

    चमन की बाड़ थी जिन का ठिकाना
    दिल शबनम को धड़काने लगे हैं

    बचाने आए थे दीवार लेकिन
    इमारत ही को अब ढाने लगे हैं

    ख़ुदा का घर तुम्हीं समझो तो समझो
    हमें तो ये सनम-ख़ाने लगे हैं
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    Amjad Islam Amjad
    ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते
    जो ज़ख़्म तू ने दिए हैं भरा नहीं करते

    हज़ार जाल लिए घूमती फिरे दुनिया
    तिरे असीर किसी के हुआ नहीं करते

    ये आइनों की तरह देख-भाल चाहते हैं
    कि दिल भी टूटें तो फिर से जुड़ा नहीं करते

    वफ़ा की आँच सुख़न का तपाक दो इन को
    दिलों के चाक रफ़ू से सिला नहीं करते

    जहाँ हो प्यार ग़लत-फ़हमियाँ भी होती हैं
    सो बात बात पे यूँ दिल बुरा नहीं करते

    हमें हमारी अनाएँ तबाह कर देंगी
    मुकालमे का अगर सिलसिला नहीं करते

    जो हम पे गुज़री है जानाँ वो तुम पे भी गुज़रे
    जो दिल भी चाहे तो ऐसी दुआ नहीं करते

    हर इक दुआ के मुक़द्दर में कब हुज़ूरी है
    तमाम ग़ुंचे तो 'अमजद' खिला नहीं करते
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    Amjad Islam Amjad

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