अब तक न खुल सका कि मेरे रू-ब-रू है कौन
किस से मुकालमा है पस-ए-गुफ़्तगू है कौन
साया अगर है वो तो है उस का बदन कहाँ
मरकज़ अगर हूँ मैं तो मेरे चार-सू है कौन
हर शय की माहियत पे जो करता है तू सवाल
तुझ से अगर ये पूछ ले कोई कि तू है कौन
अश्कों में झिलमिलाता हुआ किस का अक्स है
तारों की रह-गुज़ार में ये माह-रू है कौन
बाहर कभी तो झाँक के खिड़की से देखते
किस को पुकारता हुआ ये कू-ब-कू है कौन
आँखों में रात आ गई लेकिन नहीं खुला
मैं किस का मुद्द'आ हूँ मेरी जुस्तजू है कौन
किस की निगाह-ए-लुत्फ़ ने मौसम बदल दिए
फ़स्ल-ए ख़िज़ाँ की राह में ये मुश्क-बू है कौन
बादल की ओट से कभी तारों की आड़ से
छुप छुप के देखता हुआ ये हीला-जू है कौन
तारे हैं आसमान में जैसे ज़मीं पे लोग
हर-चंद एक से हैं मगर हू-ब-हू है कौन
होना तो चाहिए कि ये मेरा ही अक्स हो
लेकिन ये आईने में मेरे रू-ब-रू है कौन
इस बे-किनार फैली हुई कायनात में
किस को ख़बर है कौन हूँ मैं और तू है कौन
सारा फ़साद बढ़ती हुई ख़्वाहिशों का है
दिल से बड़ा जहान में 'अमजद' अदू है कौन
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